राज्य आंदोलनकारियों के आश्रितों अभ्यर्थियों ने मुख्यमंत्री धामी को ज्ञापन सौंप कर लगाई गुहार , 55 पदों का परिणाम रोके जाने पर शासन से हस्तक्षेप की मांग।

राज्य आंदोलनकारियों के आश्रितों अभ्यर्थियों ने मुख्यमंत्री धामी को ज्ञापन सौंप कर लगाई गुहार , 55 पदों का परिणाम रोके जाने पर शासन से हस्तक्षेप की मांग,

उत्तराखंड में राज्य आंदोलनकारियों और उनके आश्रितों ने कनिष्ठ सहायक–डाटा एंट्री ऑपरेटर भर्ती के परिणाम में 10 प्रतिशत आरक्षण का लाभ न दिए जाने पर तीखी नाराजगी जताई है। अभ्यर्थियों ने इसे न्यायोचित अधिकारों की अनदेखी बताते हुए मुख्यमंत्री से तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है।
दरअसल, उत्तराखंड अधीनस्थ सेवा चयन आयोग (UKSSSC) द्वारा विज्ञापन संख्या–64 (कनिष्ठ सहायक/डाटा एंट्री ऑपरेटर एवं अन्य इंटरमीडिएट स्तरीय पद) के तहत 767 पदों के सापेक्ष 26 फरवरी 2026 को 712 पदों का चयन परिणाम जारी किया गया। लेकिन शेष 55 पद, जो राज्य आंदोलनकारियों एवं उनके आश्रितों के लिए आरक्षित बताए जा रहे हैं, उनका परिणाम जारी नहीं किया गया।
क्या है आयोग का पक्ष?
अभ्यर्थियों के अनुसार 27 फरवरी को आयोग पहुंचने पर उन्हें बताया गया कि राज्य आंदोलनकारी आश्रित प्रमाण पत्र आवेदन की अंतिम तिथि (1 नवंबर 2024) के बाद जारी हुए हैं, इसलिए परिणाम रोका गया है। आयोग का कहना है कि इस संबंध में कार्मिक विभाग से पत्राचार जारी है।
अभ्यर्थियों का तर्क
आंदोलनकारियों का कहना है कि आश्रित प्रमाण पत्र जारी करने की प्रक्रिया स्वयं शासन स्तर पर विज्ञापन जारी होने के बाद शुरू की गई थी। ऐसे में अभ्यर्थियों की कोई गलती नहीं है। उनका सवाल है कि जब प्रमाण पत्र शासन की प्रक्रिया के तहत बने, तो परिणाम रोकना किस आधार पर उचित है? उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि पूर्व में विज्ञापन संख्या–63 (प्रारूपकार) में राज्य आंदोलनकारियों और उनके आश्रितों को आरक्षण का लाभ दिया जा चुका है। ऐसे में इस भर्ती में अलग रुख अपनाना समझ से परे है।

मुख्यमंत्री को सौंपा ज्ञापन
प्रभावित अभ्यर्थियों ने राजधानी देहरादून स्थित सचिवालय में ज्ञापन सौंपकर मुख्यमंत्री Pushkar Singh Dhami से मामले में शीघ्र निर्णय की मांग की है। उनका कहना है कि यदि शासन स्तर पर स्पष्ट निर्देश जारी हो जाएं तो लंबित 55 पदों का परिणाम तुरंत घोषित किया जा सकता है।

आंदोलन की चेतावनी
राज्य आंदोलनकारियों के आश्रितों ने चेतावनी दी है कि यदि शीघ्र सकारात्मक निर्णय नहीं लिया गया तो वे व्यापक आंदोलन के लिए बाध्य होंगे। उनका कहना है कि यह केवल रोजगार का नहीं, बल्कि राज्य आंदोलन की विरासत और सम्मान का भी प्रश्न है।

अब देखना यह होगा कि शासन इस संवेदनशील मुद्दे पर क्या रुख अपनाता है और क्या राज्य आंदोलनकारियों के आश्रितों को उनका आरक्षण लाभ मिल पाएगा।

uttarakhandlive24
Author: uttarakhandlive24

Harrish H Mehraa

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