नैनीताल हाईकोर्ट से वन गुर्जर समुदाय को दी बड़ी राहत, दावों के निस्तारण तक कब्जे वाली भूमि से बेदखली पर लगाई रोक, खेती में हस्तक्षेप नहीं करेगा वन विभाग।

नैनीताल हाईकोर्ट से वन गुर्जर समुदाय को दी बड़ी राहत, दावों के निस्तारण तक कब्जे वाली भूमि से बेदखली पर लगाई रोक, खेती में हस्तक्षेप नहीं करेगा वन विभाग।

नैनीताल। उत्तराखंड हाईकोर्ट ने वन गुर्जर समुदाय के अधिकारों की रक्षा करते हुए एक महत्वपूर्ण और दूरगामी प्रभाव वाला आदेश पारित किया है। वन गुर्जर समुदाय को कब्जे वाली भूमि से बेदखली से जुड़े मामले में अदालत ने स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि जब तक वनाधिकार दावों का अंतिम रूप से निस्तारण नहीं हो जाता, तब तक उन्हें भूमि से बेदखल नहीं किया जाएगा और न ही उनकी कृषि गतिविधियों में किसी प्रकार का हस्तक्षेप किया जाएगा।

यह मामला न्यायमूर्ति आलोक माहरा की एकलपीठ के समक्ष 22 जनवरी 2026 को सुनवाई के लिए आया था, जबकि आदेश की प्रमाणित प्रति 28 जनवरी 2026 को उपलब्ध हुई। अदालत ने राज्य सरकार और वन विभाग को स्पष्ट निर्देश देते हुए कहा कि वन गुर्जरों द्वारा प्रस्तुत वनाधिकार अधिनियम, 2006 के तहत किए गए दावों का निस्तारण होने तक किसी भी प्रकार की दमनात्मक कार्रवाई नहीं की जाए।

मो. अली सहित दर्जनभर अन्य याचिकाकर्ताओं ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर आरोप लगाया था कि वन अधिकारी बिना किसी वैधानिक प्रक्रिया का पालन किए उन्हें उनकी पारंपरिक भूमि से हटाने की धमकी दे रहे हैं और खेती करने से रोक रहे हैं। याचिकाकर्ताओं ने अधिनियम की नियमावली का सख्ती से पालन किए जाने की मांग की थी।

याचिकाकर्ताओं के अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि वन गुर्जर एक मान्यता प्राप्त पारंपरिक वन-निवासी समुदाय है, जिनकी आजीविका का मुख्य साधन पशुपालन और कृषि है। उन्होंने यह भी बताया कि तराई पूर्वी वन प्रभाग से संबंधित वनाधिकार दावों को लेकर मई और जून 2025 में जिलाधिकारी और वन अधिकारियों को विधिसम्मत नोटिस एवं प्रत्यावेदन सौंपे गए थे, लेकिन लंबे समय तक कोई निर्णय नहीं लिया गया, जो प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन है।

वहीं, राज्य सरकार की ओर से प्रस्तुत पक्ष में बताया गया कि ग्राम प्रधान एवं अन्य संबंधित अधिकारियों की अनुपलब्धता के कारण दावों पर विचार में देरी हुई है। हालांकि, सरकार ने यह भी स्वीकार किया कि वर्तमान में याचिकाकर्ताओं के विरुद्ध कोई बेदखली कार्रवाई नहीं की गई है। अदालत ने इस बयान को रिकॉर्ड पर लेते हुए निर्देश दिया कि लंबित दावों का निस्तारण कानून के अनुसार शीघ्र किया जाए।

अदालत ने याचिका का निस्तारण करते हुए यह भी स्पष्ट किया कि दावों पर अंतिम निर्णय आने तक वन गुर्जर समुदाय शांतिपूर्ण रूप से अपनी भूमि पर कब्जा बनाए रख सकता है और कृषि कार्य जारी रख सकता है। साथ ही न्यायमूर्ति माहरा ने सख्त शर्त लगाई कि भूमि का उपयोग केवल कृषि प्रयोजनों तक सीमित रहेगा और इसका किसी भी प्रकार का व्यावसायिक या गैर-कृषि उपयोग नहीं किया जाएगा।

यह फैसला वन गुर्जर समुदाय के लिए एक महत्वपूर्ण राहत के रूप में देखा जा रहा है और वनाधिकार अधिनियम के प्रभावी क्रियान्वयन की दिशा में एक अहम न्यायिक कदम माना जा रहा है।

 

uttarakhandlive24
Author: uttarakhandlive24

Harrish H Mehraa

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